भूमिका
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की मजबूत आधार की नींव होती है और शिक्षा पर किया गया ख़र्च एक कमजोर राष्ट्र को भी भविष्य में सशक्त बनाने का काम करता है। इसीलिए शिक्षा पर किए गए ख़र्च को पूंजीगत व्यय माना जाता है। परंतु भारत में इसके विपरीत दृश्य देखने को मिलता है। वर्ष 2014 से 2024 के बीच पेश किए गए केंद्रीय बजटों में, और खासतौर पर स्कूली शिक्षा पर, इन बजटों में गिरावट आई है।
इस लेख में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि पिछले 10 सालों में स्कूली शिक्षा के बजट में केंद्र सरकार द्वारा की गई कटौती का स्कूली शिक्षकों से संबंधित अलग-अलग पहलुओं पर कौन-कौन से नकारात्मक प्रभाव पड़े हैं।
16 जुलाई 2026 के दिन ‘जनचौक’ पर ‘1% स्कूल, 29% बजट: शिक्षा में तीखा विभाजन’ शीर्षक से इसी लेखक का एक लेख प्रकाशित हुआ था। उस लेख में बताया गया था कि साल 2014-15 में शिक्षा के लिए कुल बजट का 4.6% मिला था, जिसे 2024-25 में काफी कम करके मात्र 2.5% कर दिया गया है। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि 2014 से 2024 के 10 सालों में सरकार ने कुल बजट के हिस्से में से शिक्षा को मिलने वाले हिस्से में 46% की भारी कटौती की है।
उस लेख में हमने एक आंकड़ा और भी बताया था। हमने बताया था कि केंद्र सरकार ने अपनी जीडीपी में से शिक्षा को मिलने वाले भाग को भी काफी कम कर दिया है। शिक्षा के प्रति सरकार की असली नीयत का पता लगाने के लिए हमें यह जानना होता है कि शिक्षा पर जीडीपी का कितना प्रतिशत खर्च किया जा रहा था और अब कितना खर्च किया जा रहा है।
2014 में शिक्षा को केंद्र सरकार से जीडीपी का 0.66% मिला था, जिसे 2024 में घटाकर महज 0.37% कर दिया गया। इसका अर्थ यह है कि 2014 की तुलना में 2024 में, जीडीपी के संदर्भ में शिक्षा के बजट में 44% की कटौती की गई है।
एक तरफ तो सरकार ने अपनी जीडीपी और कुल व्यय में शिक्षा की हिस्सेदारी में करीब-करीब 50% की कटौती कर दी और दूसरी तरफ शिक्षा को मिल रहे कम बजट का उपयोग वह सरकारी ‘एलिट’ स्कूलों की एक छोटी संख्या का पोषण करने में खर्च कर रही है। केंद्र सरकार शिक्षा के क्षेत्र में ‘एलिटिज्म’ को बढ़ावा दे रही है। यह एलिटिज्म भी सामान्य नहीं है; इसके कारण दो तरह के सरकारी स्कूलों के बीच गहरी खाई तैयार हो गई है।
ऐसा एलिटिज्म जिसमें केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय और पीएम श्री स्कूलों के एक बच्चे के हिस्से में यदि 100 रुपये में से 15 रुपये आते हैं, तो सामान्य सरकारी स्कूल के एक बच्चे के हिस्से में 100 रुपये में से मात्र 70 पैसे आते हैं। एलिट सरकारी स्कूलों और सामान्य सरकारी स्कूलों के बच्चों को मिलने वाले बजट में 21 गुने का अंतर है।
यदि इन तीनों तरह के विशिष्ट स्कूलों की संख्या की तुलना कुल सरकारी स्कूलों के साथ की जाए, तो ये कुल सरकारी स्कूलों का केवल 1% हैं, लेकिन इन एक प्रतिशत स्कूलों को स्कूली बजट का 29% दिया जा रहा है। इससे स्पष्ट है कि सरकार का मकसद शिक्षा के क्षेत्र में घोर असमानता पैदा करना है।
एनईपी-2020 के अनुसार, एक अच्छा स्कूल वह है जहाँ हर बच्चे का स्वागत हो, उसकी देखभाल हो, उसे तरह-तरह की सीखने की सुविधाएँ मिलें, और बुनियादी ढाँचा बेहतर हो। लेकिन लगातार कम किए जा रहे स्कूली बजट से स्कूल का बुनियादी ढाँचा बेहतर नहीं हो सकता। अक्सर यह कहा जाता है कि शिक्षक स्कूली व्यवस्था की रीढ़ होते हैं।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी उन्हें “समाज के सबसे सम्मानित और आवश्यक सदस्य” के रूप में मान्यता देती है और शिक्षकों को शिक्षा प्रणाली के मूलभूत सुधारों के केंद्र में रखने पर जोर देती है। नीति का उद्देश्य “सर्वश्रेष्ठ और प्रतिभाशाली” युवाओं को शिक्षण पेशे में भर्ती करना और उनकी आजीविका, सम्मान और स्वायत्तता सुनिश्चित करना है। हालाँकि, यदि वास्तविक आंकड़ों और बजटीय आवंटन का विश्लेषण किया जाए, तो सरकारी बयानबाजी और जमीनी हकीकत के बीच एक गहरी खाई नजर आती है।
एक अकेले मास्टर जी
सोचिए उस नन्हे बच्चे के बारे में, जो हर सुबह अपनी फटी सी कॉपी और पेंसिल का टुकड़ा बस्ते में डालकर इस उम्मीद से स्कूल जाता है कि आज उसे कुछ नया सीखने को मिलेगा। लेकिन जब वह कक्षा में पहुँचता है, तो देखता है कि पूरा स्कूल केवल एक ही मास्टर जी के भरोसे चल रहा है।
वही एक मास्टर जी पहली कक्षा के छोटे से बच्चे को ‘अ’ से अनार सिखा रहे होते हैं, तो दूसरी तरफ पाँचवीं के बच्चों की गणित की क्लास भी देख रहे होते हैं। इसी बीच उन्हें मिड-डे मील का लेखा-जोखा भी करना है, डाक का जवाब भी देना है और दफ्तरी कागज़ात भी भरने हैं। जब मास्टर जी कागज़ों में उलझ जाते हैं, तो वह मासूम बच्चा ब्लैकबोर्ड की तरफ टकटकी लगाए सिर्फ यह सोचता रहता है कि—”मास्टर जी, आज आप मेरी कॉपी कब जाँचेंगे? आज मुझे कविता कब पढ़ाएँगे?”
यह किसी एक गाँव की कहानी नहीं है, बल्कि हमारे देश के शिक्षा तंत्र का कड़वा सच बन चुका है। साल 2017-18 में देश के लगभग 10% सरकारी प्राथमिक स्कूल सिर्फ एक शिक्षक के सहारे चल रहे थे। उम्मीद थी कि नई शिक्षा नीति के बाद हालात सुधरेंगे, लेकिन तस्वीर और भी गंभीर होती गई। 2018 से 2022 के बीच, ऐसे ‘एकल-शिक्षक स्कूलों’ की संख्या 1.05 लाख से बढ़कर 1.17 लाख हो गई—यानी 11.6% की भारी बढ़ोतरी! यह संकट सिर्फ छोटे बच्चों के प्राथमिक स्कूलों तक सीमित नहीं है।
2017-18 के आँकड़े बताते हैं कि 24,479 उच्च प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालय भी केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे थे, जिनमें से अधिकांश सरकारी स्कूल थे।
यूडीआईएसई की 2025-26 की रिपोर्ट बताती है कि आज भी देश भर में 1,00,843 एकल-शिक्षक स्कूल हैं, जहाँ 29,12,147 मासूम विद्यार्थियों का भविष्य और उनके सपने सिर्फ एक-एक शिक्षक के कंधों पर टिके हुए हैं।
समाधान की जगह ताले: जब स्कूल ही बंद होने लगे
जब आँकड़ों ने व्यवस्था को बेनकाब किया, तो होना यह चाहिए था कि नए शिक्षकों की भर्ती की जाती, खाली पड़े पदों को भरा जाता और हर गाँव के बच्चे को उसका हक दिया जाता। लेकिन व्यवस्था ने चुनौती का सामना करने के बजाय आसान और बच्चों को दर्द देने वाला रास्ता चुन लिया। शिक्षकों की कमी पूरी करने के बजाय, स्कूलों को आपस में मिलाकर ‘स्कूल क्लस्टर्स’ बनाने के नाम पर स्कूलों को बंद किया जाने लगा।
एनईपी के तहत ज़ोर इस बात पर रहा कि नए टीचर्स की भर्ती न करनी पड़े, बल्कि स्कूलों का विलय कर दिया जाए।
स्कूलों का विलय करने के साथ-साथ 2016-17 से 2021-22 के बीच सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की संख्या में 1 लाख 15 हजार की कमी आई। भारत के अलग-अलग भागों में चल रहे ‘ज़ेन-अल्फा’ के विरोध प्रदर्शन बहुत खराब हालातों के सबूत हैं। ‘ज़ेन-अल्फा’ के धरने एक अदद मास्टर के लिए भी हैं। उनकी बस इतनी सी मांग है कि “हम पढ़ना चाहते हैं, हमें टीचर दे दो।”
जब सरकारों का मन इतने से भी नहीं भरा, तो उन्होंने स्कूलों को बंद किया और उनके टीचर्स को ‘सरप्लस’ बताना शुरू कर दिया। अकेले महाराष्ट्र में 14 हज़ार से अधिक स्कूलों को बंद करने का ऐलान हुआ और उनके लगभग 29,707 शिक्षक ‘अतिरिक्त’ ठहरा दिए गए।
प्राथमिकता का सवाल
क्या हमारे पास वाकई इतने संसाधन नहीं हैं कि हम अपने बच्चों को हर विषय का एक अलग शिक्षक दे सकें? सवाल नीयत और प्राथमिकताओं का है। एक तरफ स्थिति यह है कि सरकारों के पास अपनी ब्रांडिंग और विज्ञापनों के लिए हर दिन करोड़ों रुपये का बजट होता है—जैसे उत्तर प्रदेश में ही विज्ञापनों पर हर रोज लगभग 2 करोड़ 30 लाख रुपये खर्च होने का तथ्य सामने आया है। लेकिन दूसरी तरफ, उन्हीं सरकारी प्राथमिक स्कूलों के मासूम बच्चों को न तो पेट भरकर साफ और पौष्टिक मिड-डे मील मिल पाता है, और न ही पढ़ाने के लिए शिक्षक।
जब गुरु ही असुरक्षित हों
सोचिए उस छोटे से बच्चे के बारे में, जो यही समझता है कि उसके मास्टर जी दुनिया के सबसे ताक़तवर इंसान हैं, जो सब जानते हैं। लेकिन वह मासूम यह नहीं जानता कि उसके मास्टर अंदर ही अंदर कल की रोटी और नौकरी को लेकर सहमे हुए हैं। शिक्षा के बजट में कटौती केवल कागज़ों का खेल नहीं है, यह सीधे तौर पर कक्षाओं की मिठास और पढ़ाई के स्तर को निगल रही है।
वर्तमान में लगभग 13% सरकारी शिक्षक संविदा या अंशकालिक आधार पर काम करने को मजबूर हैं। नई शिक्षा नीति के पैरा 5.17 में जिस “टेन्योर ट्रैक” प्रणाली का ज़िक्र है, वह शिक्षकों को वर्षों-वर्ष बिना किसी पक्की नौकरी के केवल एक अस्पष्ट वादे के भरोसे संविदा पर लटकाए रख सकती है।
जब शिक्षक का भविष्य ही अनिश्चितता के अँधेरे में हो, तो उसकी गरिमा और उसकी पढ़ाने की आज़ादी दम तोड़ने लगती है। “टेन्योर ट्रैक” व्यवस्था स्कूल प्रबंधन को यह असीमित शक्ति दे देती है कि वे जब तक चाहें शिक्षक को अनिश्चितता के भंवर में रखें।
बिखरता आत्म-सम्मान और सामाजिक न्याय पर चोट
शिक्षकों को कॉन्ट्रैक्ट पर रखना सिर्फ उनकी तनख्वाह का मुद्दा नहीं है, यह उनके सम्मान और सामाजिक न्याय पर सीधा हमला है। कॉन्ट्रैक्ट भर्तियों को बढ़ावा देने वाली व्यवस्थाओं से भर्ती और पदोन्नति में मिलने वाला आरक्षण परोक्ष रूप से समाप्त हो जाता है, जिससे शोषित और पिछड़े वर्गों के शिक्षकों के अधिकार छिन जाते हैं। संविदा प्रणाली में स्थायित्व के लिए ‘योग्यता’ की बड़ी-बड़ी बातें की जाती हैं, लेकिन सच तो यह है कि यह ‘योग्यता’ अक्सर उच्च वर्गों के पीढ़ियों पुराने सामाजिक विशेषाधिकारों का ही दूसरा नाम है।
‘गिग-इकोनॉमी’ के शिकार
एनईपी-2020 के पैरा 2.3 में “स्थानीय शिक्षकों” को संविदा पर भर्ती करने की बात कही गई है। इसका कड़वा सच यह है कि इन शिक्षकों को नियमित शिक्षकों की तुलना में केवल नाममात्र का वेतन दिया जाएगा। जैसे डिलीवरी करने वाले कर्मचारियों को प्रति ऑर्डर के हिसाब से रखा जाता है, वैसे ही हमारे शिक्षकों को भी अब एक अस्थाई ‘गिग वर्कर’ बनाकर छोड़ा जा रहा है। एक डरा हुआ, आर्थिक रूप से लाचार और असुरक्षित शिक्षक कभी भी एक आज़ाद, साहसी और निडर पीढ़ी का निर्माण नहीं कर सकता।
अगर हम अपने बच्चों को उज्ज्वल भविष्य देना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें उनके टीचर्स के सम्मान और उनकी सुरक्षा को क़ानूनी रूप से सुनिश्चित करना होगा।
(बीरेंद्र सिंह रावत और भूमिका का लेख।रावत दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग से संबद्ध थे और भूमिका दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग में बीएड की विद्यार्थी हैं)